पटना-बिहार राज्य मत्स्यजीवी सहकारी संघ (कॉफेड) के तत्वावधान में गुरुवार को मीन भवन सभागार, पश्चिमी बोरिंग कैनाल रोड, पटना में जलकुंभी हस्तशिल्प प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्घाटन समारोह संपन्न हुआ। कॉफेड के श्वेस्ट टू वेल्थश् कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित इस महत्वपूर्ण पहल का उद्देश्य जलाशयों में पाई जाने वाली जलकुंभी को उपयोगी एवं मूल्यवर्धित हस्तशिल्प उत्पादों में परिवर्तित कर मछुआरा समुदाय के लिए स्वरोजगार एवं अतिरिक्त आय के नए अवसर विकसित करना है।कार्यक्रम के दौरान घोषणा की गई कि 24 अक्टूबर 2026 से नालंदा जिले की परवलपुर प्रखंड मत्स्यजीवी सहयोग समिति से जलकुंभी हस्तशिल्प प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ किया जाएगा। इस कार्यक्रम के माध्यम से कॉफेड के सदस्यों को निःशुल्क प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा, जिससे वे स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का सदुपयोग करते हुए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें।
इस अवसर पर कॉफेड के प्रबंध निदेशक ऋषिकेश कश्यप ने जलकुंभी के व्यावसायिक उपयोग एवं मछुआरा समुदाय के आर्थिक सशक्तीकरण की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कॉफेड का उद्देश्य पारंपरिक मत्स्यपालन के साथ-साथ मछुआरा परिवारों को आय के वैकल्पिक साधनों से जोड़ना है। जलकुंभी का उपयोग हस्तशिल्प उत्पादों के निर्माण में किए जाने से एक ओर जलाशयों के प्रबंधन एवं पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा, वहीं दूसरी ओर मछुआरा परिवारों, महिलाओं और युवाओं के लिए स्वरोजगार के नए अवसर विकसित किए जा सकेंगे। इस पहल में टैक्सटाईल मंत्रालय, उद्योग विभाग, होप एवं आदार का सहयोग कॉफेड को लगातार प्राप्त हो रहा है।
उन्होंने बताया कि प्रशिक्षण कार्यक्रम का प्रथम चरण नालंदा जिले की परवलपुर प्रखंड मत्स्यजीवी सहयोग समिति से प्रारंभ किया जाएगा। इसके माध्यम से समिति के सदस्यों को जलकुंभी के संग्रहण, प्रसंस्करण एवं हस्तशिल्प उत्पाद निर्माण से संबंधित व्यावहारिक कौशल प्रदान करने की योजना है।
कार्यक्रम में मुकेश कुमार, असिस्टेंट डायरेक्टर, टेक्सटाइल, भारत सरकार ने जलकुंभी आधारित हस्तशिल्प उद्योग की संभावनाओं तथा ग्रामीण स्तर पर कौशल विकास के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जलकुंभी जैसी प्राकृतिक सामग्री से आकर्षक एवं उपयोगी हस्तशिल्प उत्पादों का निर्माण ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल हो सकती है। उन्होंने इस क्षेत्र में आधुनिक डिजाइन, उत्पाद की गुणवत्ता, पैकेजिंग, कौशल विकास तथा बाजार की मांग के अनुरूप उत्पादन को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर बल दिया। आगे उन्होंने कहा कि कॉफेड द्वारा नालंदा जिले के परवलपुर से प्रारंभ किया जा रहा निःशुल्क प्रशिक्षण कार्यक्रम मछुआरा समुदाय, विशेषकर महिलाओं एवं युवाओं को नए कौशल से जोड़ने तथा स्थानीय संसाधनों के मूल्य संवर्धन का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।
उन्होंने जलकुंभी से निर्मित हस्तशिल्प उत्पादों को बेहतर डिजाइन, गुणवत्ता एवं विपणन के माध्यम से स्थानीय तथा राष्ट्रीय बाजारों से जोड़ने की संभावनाओं पर विशेष ध्यान देने का सुझाव दिया। इससे ग्रामीण हस्तशिल्प, रोजगार सृजन एवं सहकारिता आधारित उद्यमिता को बढ़ावा मिलने की अपेक्षा है।
कॉफेड को भारत सरकार टेक्सटाईल मंत्रालय के द्वारा जलकुंभी हस्तशिल्प प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए इम्पैनल्ड किया गया है। भविष्य मंे चयनित प्रशिक्षणार्थियों का राशि भी उपलब्ध कराया जाएगा।
नितेश कुमार, हैन्डीक्राफ्ट, एक्सपोर्ट प्रोमोशन काउंसिल फोर हैन्डीक्राफ्ट (ईपीसीएच) ने कहा कि कॉफेड की पहल से टोकरी, बैग, कैप, हैट, मैट, कुर्सी, टेबल, सोफा, सजावटी सामग्री एवं घरेलू उपयोग की अन्य हस्तशिल्प वस्तुओं के निर्माण की संभावनाओं को बढ़ावा मिलेगा। भविष्य में इन उत्पादों को उपयुक्त बाजार से जोड़कर सहकारी समितियों के सददस्यों की आय बढ़ाने की दिशा में प्रयास किए जा सकेंगे।
जलकुंभी का 15 दिनों में दोगुना उत्पादन जलाशयों की जलीय पारिस्थितिकी एवं मत्स्यपालन गतिविधियों को प्रभावित करता है। इसके उपयोग से हस्तशिल्प उत्पादों का निर्माण पर्यावरण संरक्षण एवं ग्रामीण आजीविका विकास का एक प्रभावी मॉडल बन सकता है।
कॉफेड की निदेशक सिमरन ने कहा की कॉफेड की पहल विशेष रूप से मछुआरा परिवारों की महिलाओं एवं युवाओं को कौशल आधारित स्वरोजगार से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय संसाधनों के मूल्य संवर्धन, लघु उद्यमिता तथा सहकारी समितियों की आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।
कॉफेड के एक्सपोर्ट मैनेजर रवि राज ने कहा कि जलकुंभी से हस्तशिल्प निर्माण की यह पहल वेस्ट टू वेल्थ श्अपशिष्ट से समृद्धिश् की अवधारणा को साकार करते हुए पर्यावरण संरक्षण, कौशल विकास और मछुआरा समुदाय के आर्थिक सशक्तीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।
कार्यक्रम में जलकुंभी के उपयोग से हस्तशिल्प निर्माण, मछुआरों की आजीविका संवर्धन, कौशल विकास एवं सहकारिता आधारित स्वरोजगार की संभावनाओं को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया। कॉफेड का लक्ष्य राज्य के लाखों मछुआरों एवं उनके परिवारों के लिए आजीविका के वैकल्पिक अवसर विकसित करना तथा सहकारिता के माध्यम से आत्मनिर्भरता एवं आर्थिक समृद्धि को प्रोत्साहित करना है।
कार्यक्रम में प्रदीप कुमार सहनी, निदेशक, कॉफ्फेड, दीनबंधु चौधरी, मंत्री, बिहटा प्रखंड मत्स्यजीवी सहयोग समिति; विजय कुमार बिंद, मंत्री, नावानगर प्रखंड मत्स्यजीवी सहयोग समिति तथा ओम प्रकाश चौधरी, सदस्य, मनेर प्रखंड मत्स्यजीवी सहयोग समिति सहित मत्स्य सहकारिता क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों की सहभागिता रही।
इस अवसर पर कॉफ्फेड के पदाधिकारीगण् मुनव्वर अली, प्रमोद कुमार रजक, मोनू कुमार, रानी सहनी, कंचन वाला, अमृतेश आनंद, सुप्रिया, भारती कुमार, स्वास्तिका राज, रवि सहनी, प्रकाश कुमार एवं चंदन कुमार।