नालंदा, : बिहार राज्य मत्स्यजीवी सहकारी संघ (कॉफ्फेड) के तत्वावधान में शुक्रवार को नालंदा जिले के परवलपुर प्रखंड अंतर्गत हरप्रसाद बिगहा में परवलपुर प्रखंड मत्स्यजीवी सहयोग समिति में जलकुंभी हस्तशिल्प प्रशिक्षण कार्यक्रम कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि माननीय श्री हरि सहनी, सदस्य, बिहार विधान परिषद एवं पूर्व मंत्री, बिहार सरकार ने किया। कॉफ्फेड के महत्वाकांक्षी ’’वेस्ट टू वेल्थ (अपशिष्ट से संपदा)’’ कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित इस पहल का उद्देश्य जलाशयों में तेजी से फैलने वाली जलकुंभी का उपयोग हस्तशिल्प निर्माण में कर मछुआरा समुदाय, विशेषकर महिलाओं एवं युवाओं को स्वरोजगार के अवसरों से जोड़ना है। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता एवं प्रशिक्षक के रूप में ’’ ऋषिकेश कश्यप, प्रबंध निदेशक, कॉफ्फेड’’ तथा वक्ताओं के रूप में ’’शिवनंदन प्रसाद एवं अरूण सहनी, निदेशक, कॉफ्फेड’’ और ’’राजकुमार केवट, मंत्री, परवलपुर प्रखंड मत्स्यजीवी सहयोग समिति’’ एवं प्रशिक्षण के लिए ’’नीलमहब मोण्डल, बीना हाजरा एवं नंदीता बागड़ी’’ ने प्रशिक्षण दिया। कार्यक्रम का प्रमुख विषय जलकुंभी से हस्तशिल्प उत्पाद निर्माण एवं उसके माध्यम से आजीविका के नए अवसर विकसित करना रहा। जलकुंभी एक तेजी से फैलने वाला जलीय पौधा है, जो तालाबों, पोखरों, झीलों एवं अन्य जलाशयों की सतह को ढक लेता है। इसके अत्यधिक फैलाव से सूर्य का प्रकाश पानी के भीतर नहीं पहुँच पाता तथा जलीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है। इससे मत्स्य पालन, नौका संचालन और जलाशयों के प्रबंधन में कठिनाइयाँ उत्पन्न होती है।ऋषिकेश कश्यप ने कहा कि जलकुंभी के पत्ते से मवेशियों के लिए चारा, जड़ों से खाद एवं रेशेदार डंठलों को सुखाकर एवं प्रसंस्कृत करके बैग, टोकरी, चटाई, टेबल मैट, सजावटी सामान और अन्य उपयोगी हस्तशिल्प उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। इसी संभावना को ध्यान में रखते हुए कॉफ्फेड ने जलकुंभी हस्तशिल्प प्रशिक्षण की पहल की है। कॉफ्फेड के सदस्यों के लिए प्रशिक्षण निःशुल्क दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जलकुंभी जैसे प्राकृतिक संसाधन का उपयोग करके मछुआरा परिवारों को कौशल विकास से जोड़ना है। हस्तशिल्प निर्माण में जलकुंभी का चयन, डंठलों की सफाई, सुखाने, छँटाई, बुनाई तथा उत्पादों की फिनिशिंग जैसे महत्वपूर्ण चरणों का प्रशिक्षण आगामी 15 दिनों में दिया जाएगा। प्रशिक्षण के माध्यम से प्रतिभागियों को इन तकनीकों में दक्ष बनाकर भविष्य में स्वरोजगार एवं लघु उद्यम स्थापित करने योग्य बनाने का लक्ष्य है। इस कार्यक्रम के माध्यम से नालंदा जिले के हजारों मछुआरों तक रोजगार की संभावनाएँ विकसित होने की उम्मीद व्यक्त की गई है।आगे उन्होने कहा कि कॉफ्फेड की इस पहल से मछुआरा परिवारों की महिलाओं एवं ग्रामीण युवाओं को पारंपरिक मत्स्य पालन के अतिरिक्त आय अर्जित करने का एक नया माध्यम मिलेगा। प्राकृतिक रेशों से तैयार हस्तशिल्प उत्पादों के निर्माण के लिए स्थानीय स्तर पर कच्चा माल उपलब्ध होने की संभावना भी इस गतिविधि को विशेष बनाती है। वहीं, जलाशयों से अतिरिक्त जलकुंभी हटाकर उसका उपयोग उत्पाद निर्माण में करने से जलाशयों के प्रबंधन एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को भी सहयोग मिलेगा। कॉफ्फेड का यह प्रशिक्षण कार्यक्रम ग्रामीण कौशल विकास, प्राकृतिक संसाधनों के मूल्यवर्धन एवं मछुआरा समुदाय की आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। हरि सहनी, सदस्य, बिहार विधान परिषद एवं पूर्व मंत्री, बिहार सरकार ने कहा कि जलकुंभी लंबे समय से जलाशयों एवं मछुआरों की आजीविका के लिए गंभीर समस्या बनी हुई है। कॉफ्फेड द्वारा जलकुंभी से हस्तशिल्प उत्पाद बनाकर रोजगार सृजन की पहल सराहनीय है। इससे जलाशयों के संरक्षण के साथ मछुआरा परिवारों, विशेषकर महिलाओं एवं युवाओं को स्वरोजगार के नए अवसर मिलेंगे। उन्होंने कहा कि ष्जिस जलकुंभी को अब तक समस्या माना जाता था, वही अब मछुआरों की आर्थिक समृद्धि का आधार बनेगी।ष् उन्होंने इस प्रशिक्षण कार्यक्रम को बिहार के अन्य जिलों में भी विस्तारित करने की आवश्यकता बताई। ’’जलाशय संरक्षण से स्वरोजगार और अपशिष्ट से समृद्धि’’ की अवधारणा के साथ कॉफ्फेड मछुआरा परिवारों के लिए वैकल्पिक आजीविका विकसित करने की दिशा में प्रयासरत है। इस अवसर पर कार्यक्रम का संचालन कॉफेड की निदेशक सिमरन ने किया एवं निर्यात मैनेजर रवि राज, गोपी कुमार, जिला परिषद सदस्य उदयनंदन प्रसाद, राम प्रवेश बिंद, सूरज केवट, धर्मवीर सिंह एवं भारी संख्या में प्रशिक्षणार्थी उपस्थित थे।